#UPPolice

राम है तभी तो रावण है, जब रावण ही नहीं तो राम की क्या महत्ता ? आतंकवादी, बलात्कारी और नक्सलवादी भी तो इसी समाज से निकलकर आते हैं तो फिर पुरे समाज को आतंकवादी, बलात्कारी और नक्सलवादी समझना कहाँ तक उचित है।
लोग सर्दी के मौसम में 2 पल के लिए अपने रजाई से बाहर नहीं निकलना चाहते, पुलिस और सेना के लोग कड़ाके के ठंड में भी सड़क और सीमा पर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हैं। हम अपने परिवार के साथ खुशियाँ मनाते हैं, ये हमारे परिवार को खुशियाँ बाँटते हैं। हमें सदैव पुलिस और सेना के जवानों पर गर्व महसूस करना चाहिए। 🙏

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पुरूषवादी समाज में पीसती महिलाएं

कल सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 पर अपना फैसला सुनाया। निश्चित तौर पर ऐतिहासिक फैसला था। अचरज तो तब हुआ जब sc/st कानून पर सुप्रीम कोर्ट को महिमामंडित करने वाले कुछ लोग आज सुप्रीम कोर्ट के जजों को भंगेड़ी – नसेड़ी कहने से नहीं चुक रहे थे। इस घटना में समाज के प्रबुद्ध और विद्वान लोग शामिल थे। पर सवाल यह है कि विरोध क्यों?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह है कि शादी के उपरांत किसी अन्य के साथ बनाये गए संबंध गैरकानूनी नहीं है। तलाक के विकल्प खुले हैं। दरअसल ये पुरूषवादी मानसिकता वाली समाज महिलाओं को उनका हक न तो कभी दिया है और न कभी देना चाहती है। युगों युगों से ये परंपरा चली आ रही है। सीता हो या द्रौपदी सबने इसके दंस झेले। अहिल्या का बलात्कारी इंद्र तो देवराज बन गया। समाज और परिवार की दुहाई देने वाले लोग तब क्यों गूंगे हो जाते हैं जब बच्चियों को पैदा होने से से पहले ही मार दिया जाता है। तब ये परिवार क्यों मूकदर्शक बना रहता है जब उसी के आंगन में बेटियों को समान अवसर नहीं मिल पाता।
आज वही लोग आवाज उठा रहे हैं जो महिलाओं को बस उपभोग की बस्तु समझ बैठे हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चियों को बाल्यकाल में शादी कर दी जाती है। 8/6 के कमरे में बंद कर दिया जाता है। उसके सपने, उसके ख्वाब, उसकी प्रतिभा सब नष्ट कर दी जाती है। उस कमरे से अगर कुछ बाहर जाती है तो बस चार कंधे पर उसका लाश। तब इस निर्दयी समाज की रूह क्यों नहीं काँपती।

संविधान हमें समानता का अधिकार देता है। हमें जीने का अधिकार देता है। हमें अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार देता है। सड़क पर परदर्शन करने का अधिकार देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। फिर अपनी मर्जी से संबंध बनाने का अधिकार क्यों नहीं ?

भारत बंद

आश्चर्य ये नहीं है कि इस देश की प्रगति को

एक दिन के लिए बाधित करने का प्रयास किया गया, एक आम जन के अधिकारों का हनन किया गया पर हक का मतलब न जाननेवाले लोगों को हक के लिए लड़ते देखने का नजारा अद्भुत है।
हमें अपने हक की पूर्ति के लिए सामने वाले के हक को कूचलने का अधिकार तो नहीं ?

जातिगत गिरफ्तारी की सरकार का फरमान गलत है पर उसके खिलाफ में हिंसक प्रदर्शन को न्योचित कैसे माना जा सकता? स्कूलों में ताले, सड़क पर आवागमन बाधित, सरकारी संपत्तियों का नुकसान और छोटे मोटे व्यापारियों के व्यापार पे ठप्पे। ये कैसी हक की लड़ाई है जिसमें एक दूसरे के हक को कूचलना निहित है। आज सामाजिक न्याय की बात करने बाले लोग खुद कभी समाज के साथ न्याय कर नहीं पाए। समाज खुद कभी जाति और धर्म के आडंबरों से निकल नहीं पाया और निकलना नहीं चाहता, इस सच को भी छुपाया नहीं जा सकता।

सरकार की भी मजबूरियाँ हैं क्योंकि बिना मजबूरियों के सरकार कहाँ? फैसले लिए जाएं तो भी भारत बंद और न लिए जाएं तो भी भारत बंद। और सरकार की इसी मजबूरियों का फायदा असमाजिक तत्व उठा रहे हैं। सत्ता सत्ता के लिए कोई भी कर्म करने से नहीं चूकती और विपक्ष सत्ता के लिए कोई कुकर्म करने से नहीं चूक रहा। और इन परिस्थितियों में विदेशी शक्तियाँ देश को खोखला करने से नहीं चूक रही। जाति और धर्म के नाम पर समाज में उन्माद फैला रही। और अंतोगत्वा नुकसान एक सामान्य जीवन उठा रही है।